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History

इतिहास

श्री सरस्वती संस्कृत कॉलेज, खन्ना की स्थापना सन् 1907 ई में हुई। यह खन्ना की सबसे प्राचीन संस्थाओं में से एक है। पं. वासुदेव जी की अध्यक्षता में ब्राह्मणसंघ हुआ जिसमें इस विद्यालय की नींव रखी। पहले उत्तर भारत में काशी, अमृत्सर और कश्मीर संस्कृत के केन्द्र थे, जिनमें सभी विषयों के विद्वान् तथा संस्कृत साहित्यकार प्रचूर मात्रा में विराजमान थे। पं. रविनन्दन जी को संस्कृत पाठशाला, खन्ना का प्रथम अध्यापक नियुक्त किया गया। सन् 1920 के करीब पुज्यपाद पं. श्री वंशीधर ज्योतिषी जी का पाठशाला में शुभागमन हुआ। उनके साथ संस्कृत के धुरन्धर विद्वान पं. कृष्ण शास्त्री व पं. लोकमान्य जी को भी नियुक्त किया गया। श्रद्धेय आचार्य विश्वनाथ शास्त्री जी ने सन् 1923 में इस पाठशाला में प्राधानाध्यापक के रूप में पदार्पण किया। इस संस्था में सर्वप्रथम शास्त्री उत्तीर्ण करने वाले पं. माधवदत्त, नरदेव, जयदेव तथा अर्जुनदेव इत्यादि थे। इस प्रकार यह संस्था बहुत ही लम्बे समय से संस्कृत की सेवा में तत्पर है।

सन् 1940 में स्वामी करपात्री जी महाराज का इस विद्यालय में शुभागमन हुआ था। खन्ना नगर में धर्मसंघ के लिये करपात्री जी ने श्री सरस्वती संस्कृत कालेज को चुना। उन्होंने विद्यालय के प्रांगण में आचार्य विश्वनाथ जी की उपस्थिति में सभी नगर निवासियों को प्रेरित किया। उन्होंने धर्मसंघ की स्थापना की जिसमें खन्ना के कई जाने - माने व्यक्तियों ने हिस्सा लिया। 1959 में इसने अपनी स्वर्णजयन्ती मनाई, जिसमें पंजाब के महामान्य राज्यपाल श्री नरहरिविष्णु गॉडगिल एवं पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ के उपकुलपति श्रीमान् ए.एस. जोशी विशेष अतिथि के रूप में पधारे। इससे पूर्व सन् 1954 में भारत सरकार द्वारा डा. सूनीति कुमार की अध्यक्षता में नियुक्त संस्कृत कमीशन ने यहां पधार कर संस्था को गौरवान्वित किया एवं इसकी सेवाओं के प्रति संतोष प्रकट किया।1993-94 में हीरक जयन्ती समारोह का आयोजन किया गया, जिसके मुख्यातिथि तत्कालीन पंजाब के राजस्व मंत्री श्री शमशेर सिंह दुल्लो और उद्योग तथा सभ्याचार मंत्री श्री कर्म सिंह गिल थे। सन् 1997 से यह राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली से जुड़कर कार्य कर रही है। यह राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान की एक लघु शाखा है, जो समय समय पर संस्कृत के लिये कार्य करती रहती है।

आचार्य विश्वनाथ

आचार्य विश्वनाथ शास्त्री का जन्म 12  अप्रैल, 1902 को हुआ। इनकी गणना पंजाब में ही नहीं अपितु समूचे भारत में उन संस्कृत प्रकाण्ड विद्वानों में की जाती है जिन्होने संस्कृत भाषा के विकास और प्रसार के लिये अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। आचार्य विश्वनाथ जी ने शास्त्री, दर्शनाचार्य, व्याकरणाचार्य की उपाधियां प्राप्त कर 1923 में श्री सरस्वती संस्कृत कालेज में अपनी सेवा प्रारम्भ की। लगभग 50 वर्ष उन्होंने यहां प्राचार्य के पद पर आसीन रहे। इसके बाद भी जीवन पर्यन्त इस संस्था के निदेशक के रूप में इस महान् सस्था का नेतृत्व किया। आचार्यश्री को एक आदर्श अध्यापक, महान् साहित्यकार, प्रखर पण्डित और महात्यागी एवं तपोनिधि होने के नाते अपने शिष्यों, नगरनिवासियों, पंजाब सरकार, भारत सरकार व अन्य समाज सेवी संस्थाओं से भरपूर सम्मान प्राप्त हुआ। 3 अगस्त, 1997 में आचार्य जी दिवंगत हुए।

उनके द्वारा प्राप्त विशिष्ट सम्मान इस प्रकार है-

  • 3 दिसंबर, 1966 को महामहिम डा. राधाकृष्णन, राष्ट्रपति द्वारा आचार्य विश्वनाथ शास्त्री जी को अध्यापक प्रवरता राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया।

  • 25 दिसम्बर, 1966 को श्री सरस्वती संस्कृत कालेज स्नातक मण्डल द्वारा अभिनन्दन हुआ।

  • महामहिम राष्ट्रपति संजीवा रेड्डी द्वारा 28 मार्च 1981 को प्रख्यात संस्कृतविद्वान् पुरस्कार (रष्ट्रपति सम्मान) से सम्मानित हुए।

  • देववाणी परिषद्, दिल्ली के महासचिव रमाकान्त शुक्ल द्वारा सन 1981 में आचार्य जी का सादर सम्मान हुआ।

  • पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा सन् 1984 में आचार्य जी को “शिरोमणि संस्कृत साहित्यकार” पुरस्कार प्राप्त हुआ।

  • पंजाब प्रदेश संस्कृत अकादमी, नाभा द्वारा 1993 में उनके 62वे जन्म के उपल्क्ष्य पर सम्मानित किया गया।

आचार्य विश्वनाथ जी की साहित्यिक रचनायें-

  • श्रीविष्णुसहस्रनाम का हिन्दी अनुवाद, धर्म प्रेस, मेरठ, 1989

  • लघुसिद्धान्तकौमुदी- उपेन्द्रविवृति, मोती लाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित

  • मध्यसिद्धान्तकौमुदी- प्रभाकर विवृति, मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित

  • बालनिबन्धादर्श, मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित

  • आदर्शप्रस्तावरत्नमाला, मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित

  • तर्कसंग्रहः, हिन्दी अनुवाद, भारतीय संस्कृत भवन, जालन्धर द्वारा प्रकाशित

  • कणादगौतमीयम्(पदार्थानुशासनम्) महाविद्यालय द्वारा प्रकाशन

  • प्रारम्भिक-पाणिनीयम्, मोतीलाल बनारसीदास द्वारा प्रकाशित

  • भारतीय दर्शनों में वेदान्त का स्थान,शोध प्रबन्ध, संस्कृतामृत पत्रिका, नई दिल्ली में प्रकाशित

  • भगवत्स्तुति-संग्रह, 1994,भक्ति पत्रिका,रिवाडी द्वारा प्रकाशित

  • आदर्श-महाभाष्य-प्रश्नोत्तरी(आह्निकद्वयम्) भारतीय संस्कृत भवन, जालन्धर द्वारा प्रकाशित

  • न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रश्नोत्तरी, मोतीलाल बनारसीदास द्वारा 1978 में प्रकाशित