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ज्ञान की ज्योति जलाता — श्री सरस्वती संस्कृत कॉलेज

एक ऐसा शिक्षा मंदिर जहाँ वैदिक ज्ञान, संस्कृति और संस्कारों की गूंज आज भी जीवंत है। यहाँ छात्र न केवल शिक्षा प्राप्त करते हैं, बल्कि भारतीय परंपरा और मूल्यों को आत्मसात करते हैं।

सरस्वती श्रुति महती महीयताम्

प्राचीन गुरुकुल परंपरा और आधुनिक शिक्षा प्रणाली का अद्भुत समन्वय है। संस्कृत भाषा, वेद, और शास्त्रों की गहराई से शिक्षा प्रदान कर हम संस्कृति की जड़ों को मजबूत करते हैं।

संस्कृत शिक्षा का अग्रणी संस्थान

जहाँ विद्यार्थियों को शास्त्र, वेद, व्याकरण और धर्मशास्त्र की गहन शिक्षा दी जाती है, आत्मिक और बौद्धिक विकास के साथ।

संस्कृत शिक्षा का अग्रणी संस्थान

जहाँ विद्यार्थियों को शास्त्र, वेद, व्याकरण और धर्मशास्त्र की गहन शिक्षा दी जाती है, आत्मिक और बौद्धिक विकास के साथ।

श्री सरस्वती संस्कृत कॉलेज खन्ना पञ्जाब में स्थित भारत की वह संस्था है जिसका पूर्ण उद्देशय संस्कृत का प्रचार प्रसार करना है। संस्कृत को केवल संस्कृत के छात्रों तक सीमित न रखते हुए इसको जन जन की भाषा बनाना है। आप भी इस संस्था के साथ जुड़कर राष्ट्र की सेवा करें क्योंकि संस्कृत की सेवा राष्ट्र की सेवा के तुल्य है

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श्री सरस्वती संस्कृत कॉलेज, खन्ना

पंजाब प्रान्त के व्यवसायिक नगर खन्ना, जिला लुधियाना में श्री सरस्वती संस्कृत कालेज में संस्कृत एवं सनातन भारतीय संस्कृति के प्रचार, प्रसार हेतु सन् 1907 से सफलतापूर्वक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। न केवल पंजाब में अपितु संपूर्ण उत्तर भारत में संस्कृत के क्षेत्र में सुविख्यात आज पंजाब में संस्कृत के उत्थान के लिये यह संस्था पूर्णतः तत्पर है। यह संस्था कुछ संस्थान के अनुदान व बाकि नगर वासियों के दान से चलती है। राष्ट्रपति सम्मानित आचार्य विश्वनाथ, ज्योतिषि वंशीधर जी व पं. यशोदेव शास्त्री जैसे संस्कृत की दिव्य विभूतियों ने इस विद्यालय को अपनी महान सेवा दी है।

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संस्कृत भारती भारत की वह संस्था है जिसका पूर्ण उद्देशय संस्कृत का प्रचार प्रसार करना है। संस्कृत को केवल संस्कृत के छात्रों तक सीमित न रखते हुए इसको जन जन की भाषा बनाना है। इसके केन्द्र सम्पूर्ण भारतवर्ष में है। आप भी इस संस्था के साथ जुड़कर राष्ट्र की सेवा करें क्योंकि संस्कृत की सेवा राष्ट्र की सेवा के तुल्य है। जयतु संस्कृतं जयतु भारतम्


  • धन्यं हि भारतं वर्षं धन्या भारतसंस्कृति।
  • भारतीया जना धन्याः धन्यास्माकं परम्परा॥
  • सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
  • अहं त्वां सर्वपापेभ्योः मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
  • यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
  • तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नितिर्मतिर्मम॥
  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
  • मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि॥

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